Tuesday, October 13, 2009

एक सुबह ऐसा भी ....


एक रोज़ सूरज की किरण
प्रस्फुटित होकर ,
नजाने कितने मीलों को तय कर,
आई मुझसे मिलने...

संदेश था कुछ,
शायद मेरे लिए
या फिर मुझ जैसे
असंख्य ,अनगिनत
समाज से अनभिज्ञ
स्वयं सेवा में लिप्त ,
आज के युवा के लिए
जो अब तक सो रहा है...

उसने कहा :

निशा ने करवट बदल ली है ,
अंधकार के बादल छट चुके हैं
रात्रि का प्रांगण ख़त्म हुआ,
और सुबह हो गई है
अपनी आँखें खोलो मनुज

ह्रदय से बोलो मनुज
जागो मनुज!

बहिर्मन से अंतर्मन की यात्रा
बस कुछ क्षण

मेरे शिथिल मन में जैसे

वो किरण,
शक्ति का संचार कर गई हो ..

अहसास हुआ सहज ही
अँधेरा छट चुका है.....
और अब
सुबह हो चुकी है ......

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