Tuesday, April 22, 2014

तुम न आई पर तुम्हारी याद आई 
और साथ लाई अपने 
अनगिनत लम्हों कि फ़रियाद , 
वो आंसू भी, जो कभी बहा करते थे 
ख़ुशी में और कभी ग़म में 
अब भी बहते हैं थोड़े - कभी कभी 
शायद वो भी अपने होने का मतलब ढूंढते हैं 

तुम्हारी वो हर बात, वो मासूम मुस्कराहट 
मेरे रगो में लहू कि तरह दौड़ जाते हैं अक्सर 
और एहसास कराते हैं - मेरे न होने का
मेरे अस्तित्व का ये कैसा भेद, ये कैसी पहेली ?

तुम न आई पर तुम्हारी याद आई ..

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