सड़क पर 'काला कफ़न' ओढ़कर
वो कौन चला जा रहा है …
तुम्हारे शहर के ख़ाक में न जाने कितने आसमाँ बनाये होंगे उसने,
और कितने तारों से रोज़ बातें की होगी
स्याह रात की सुनसान फुटपाथ पर लगी किसी ठेले के ऊपर
या किसी रेलवे प्लेटफार्म के बाहर फटी चादर पर सोये हुए …
वो कौन चला जा रहा है , 5-6 रोटियां और कुछ कपड़े उठाये ,
गठरियों की छोटी पोटली में छोटा संसार समाये
साथ ऊँगली पकड़े छोटे बच्चे अधनंगे –
समाज और सरकार की तस्वीर हो जैसे .
और खुली धुप में स्त्री-पुरुष का भेद मिटाती वो अधेड़ महिला
सवाल पूछ रही है सेमिनार रूम के तमाम विद्वानों से …
अब जब शहर जल ही रहा है, तो क्यों जाने दिया उसे
रोक लेते बुझाने को,
नजाने कितने आग बुझाये होंगे उसने और
डूबतो को बचाया भी होगा …
वो कौन चला जा रहा है 'काला' कफ़न ओढ़कर
सफ़ेद ; माने जो मैला न हो - जो आपका है ,
आपके सभ्य समाज की पेशानी पे लगा एक सुन्दर टीका
मंदिर मस्जिद के संगमरमर होने का गुरूर
और फेयर & लवली के जादू का एहसास …
रेलवे लाइन पे बिखरा वो मुर्दा शरीर , और बगल में बिखरी रोटियां
अगर ज़िंदा न कर पाए तुम्हारे दिल में उनका दर्द
और लगा न पाए सीने में आग , हिला न पाया तुम्हारा ज़मीर
तो मुर्दा तुम हो - 'सफ़ेद' कफ़न में लिपटे ज़िंदा लाश .
सड़क पर 'काला' कफ़न ओढ़कर
वो कौन चला जा रहा है…
--- रुहदार

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