Wednesday, December 5, 2012

स्वतः कलम की स्याही, मेरी आत्मा से रजकर
बनकर मेरी कविता  है चाहती ये कहना
कुछ इस तरह से इस क्षण ............
 
चाहता हूँ तुम्हे कुछ दूं, कुछ ऐसा जैसा तुमने कभी नहीं पाया
ह्रदय भी दे दूं वो भी कम है.............

 

तुमने देखा है प्रातः नभ में प्रस्फुटित सूरज की पहली किरण,
या फिर असंख्य तारो के बीच झिलमिलाते  चाँद की चांदनी,
पंछियों का चहचहाना, फूलों का रोज़ खिलना?
चाहता हूँ दे दूँ  वसुन्धरा कि सुषमा
खुशियाँ समस्त जग कि तुम्हे चाहता हूँ देना ....

क्या देखा  है तुमने  एक चातक को
जो अनगिनत वर्षो तक इन्तजार करता है,
अपने घनश्याम  घन  क़ा ?
 उस प्रेममय की सच्ची उस भावना को अर्पित
कदमों में अब तुम्हारे  दिल चाहता है करना....

तुमने देखा है कभी एक नवजात शिशु के मुख को और
समझा है स्वच्छ, निश्छल, सम्पूर्ण उसके मन को ?
माँ के हृदय की ममता और उस शिशु की सुषमा,
भावना के मोति की एक सुन्दर माला,
तुमको मैं ऐ मेरी दोस्त , मैं चाहता हूँ देना  ...

बनकर के प्रार्थना अब  इश्वर के आज दर पर
मैं चाहता हूँ कहना उनसे ये आज हरपल
के खुश रहो सदा तुम चाहे जहाँ कहीं हो
न हो कभी कोई गम बस मुस्कुराहटें  हो
हर प्रार्थना को अर्पित करता हूँ आज तुमको
मन का  मयूर मंदिर
तुम्हें चाहता हूँ देना !!

मैं सोचता हूँ हर पल, खुद से मैं पूछता हूँ
तुमको खुदी में अक्सर हर रोज़ ढूंढता हूँ
हो चाँद  चाँदनी कि या फिर उषा कि लाली,
सुषमा हो अप्सरा का या हो परी निराली,
काया हो तुम तुम कमल की, अल्फाज़ इस गज़ल  की,
आँखों  क़ा भ्रम हो  मेरे या हो मेरी हकीकत ?

मैं  चाहता हूँ  कहना तुमसे हे प्रियतमा! सुन
जो भी हो तुम ये सुन लो धड्कन हो इस हृदय की
तुमसे है ये गुज़ारिश, इतनी सी  है तमन्ना
बनकर हृदय की धारा बहता  रहूँ मैं कल कल
उस भावना की नद में जो प्रेम है तुम्हारा .....

चाहता हूँ तुम्हे कुछ दूं, कुछ ऐसा जैसा तुमने कभी नहीं पाया
ह्रदय भी दे दूं वो भी कम है..........................

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